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कामाख्या स्तोत्रम् | Kamakhya Devi Stotram Hindi & English PDF

कामाख्या देवी के स्तोत्र (Kamakhya Devi Stotram) का पाठ भक्तिभाव से किया जाए तो इस पाठ को करने से आत्मा को शांति, शक्ति, और मन को संतुलन करने में मददरूप होता है।  कामाख्या देवी, एक अदभुत देवी हैं जो भारतीय सनातन धर्म में मुख्य स्थान पर उसकी पूजा की जाती हैं। इस देवी को प्राकृतिक शक्ति, सृष्टि, और पुनर्जीवित की देवी से भी जाना जाता है। कामाख्या मंदिर असम में है, जहाँ पर लाखों भक्तों इस जगह पे जाते है और देवी का दर्शन का लाभ उठाते है।

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Kamakhya Stotram in Hindi

जय कामेशि चामुण्डे जय भूतापहारिणि।
जय सर्वगते देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते।।

विश्वमूर्ते शुभे शुद्धे विरुपाक्षि त्रिलोचने।
भीमरुपे शिवे विद्ये कामेश्वरि नमोऽस्तु ते।।

मालाजये जये जम्भे भूताक्षि क्षुभितेऽक्षये।
महामाये महेशानि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते।।

कालि कराल विक्रान्ते कामेश्वरि नमोऽस्तु ते।।

कालि कराल विक्रान्ते कामेश्वरि हरप्रिये।
सर्व्वशास्त्रसारभूते कामेश्वरि नमोऽस्तु ते।।

कामरुप- प्रदीपे च नीलकूट- निवासिनि।
निशुम्भ- शुम्भमथनि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते।।

कामाख्ये कामरुपस्थे कामेश्वरि हरिप्रिये।
कामनां देहि में नित्यं कामेश्वरि नमोऽस्तु ते।।

वपानाढ्यवक्त्रे त्रिभुवनेश्वरि।
महिषासुरवधे देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते।।

छागतुष्टे महाभीमे कामख्ये सुरवन्दिते।
जय कामप्रदे तुष्टे कामेश्वरि नमोऽस्तु ते।।

भ्रष्टराज्यो यदा राजा नवम्यां नियतः शुचिः।
अष्टम्याच्च चतुदर्दश्यामुपवासी नरोत्तमः।।

संवत्सरेण लभते राज्यं निष्कण्टकं पुनः।
य इदं श्रृणुवादभक्त्या तव देवि समुदभवम्।।

सर्वपापविनिर्म्मुक्तः परं निर्वाणमृच्छति।
श्रीकामरुपेश्वरि भास्करप्रभे, प्रकाशिताम्भोजनिभायतानने।
सुरारि- रक्षः – स्तुतिपातनोत्सुके, त्रयीमये देवनुते नमामि।।

सितसिते रक्तपिशङ्गविग्रहे,
रुपाणि यस्याः प्रतिभान्ति तानि।
विकाररुपा च विकल्पितानि,
शुभाशुभानामपि तां नमामि।।

कामरुपसमुदभूते कामपीठावतंसके।
विश्वाधारे महामाये कामेश्वरि नमोऽस्तु ते।।

अव्यक्त विग्रहे शान्ते सन्तते कामरुपिणि।
कालगम्ये परे शान्ते कामेश्वरि नमोऽस्तु ते।।

या सुष्मुनान्तरालस्था चिन्त्यते ज्योतिरुपिणी।
प्रणतोऽस्मि परां वीरां कामेश्वरि नमोऽस्तु ते।।

दंष्ट्राकरालवदने मुण्डमालोपशोभिते।
सर्व्वतः सर्वंव्गे देवि कामेश्वरि नमोस्तु ते।।

चामुण्डे च महाकालि कालि कपाल- हारिणी।
पाशहस्ते दण्डहस्ते कामेश्वरि नमोऽस्तु ते।।

चामुण्डे कुलमालास्ये तीक्ष्णदंष्ट्र महाबले।
शवयानस्थिते देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते।।

।। इति श्री कामाख्या स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

Kamakhya Devi Stotram

कामाख्या सहस्त्रनाम स्तोत्र –

कामाख्या सहस्त्रनाम स्तोत्र में देवी के हजार नामों की महिमा बताई गई है, जो भक्तों को उनकी अदभुत शक्तियों के बारे में महसूस कराती है।

कामाख्या कवच –

कामाख्या कवच स्तोत्र कामाख्या देवी की रक्षा के लिए पढ़ा जाता है यह स्तोत्र पढ़ने से भक्तों को सुरक्षा और साधना करने में मददरूप होती है

कामाख्या स्तुति –

कामाख्या स्तोत्र pdf में देवी की स्तुति का उल्लेख किया गया है इस स्तुति को पढ़ के भक्त उनके स्वरुप का स्मरण करते है और यह देखकर देवी उनके भक्तों पर कृपा बरसाते है।

Kamakhya Stotra Benefits in Hindi

असम मंदिर के गर्भगृह में कामाख्या देवी की योनि पीठ है जहाँ पर कामाख्या देवी के स्तोत्र का पाठ करते हो तो आपको आधात्मिक शांति का अहसास होता है। यह स्तोत्र का पाठ करने से आपको अपने जीवन में सफलता और समृद्धि की और ले जेने के लिए मददरूप होता है।

 आप मंदिर में इस स्तोत्र का उपयोग एक तांत्रिक विधि के लिए भी कर सकते हो। ऐसे तो यह स्तोत्र के पाठ करने से बहोत सारा लाभ मिलता है। यह हर व्यक्ति को अपने अपने कर्मो के अनुसार फल प्राप्ति होती है।

Kamakhya Stotram Meaning in English

Jai Kameshi Chamunde, Jai Bhutapharini.

Jai Sarvgate Devi Kameshwari Namostu Te.

Vishwamoorte Shubhe Shudhe Virupakshi Trilochane.

Bhimarupe Shive Vidye Kameshwari Namostu Te.

Malajaye jaaye jambhe bhutakshi kshubhiteyakshaye.

Mahamaye Maheshani Kameshwari Namostu Te.

Kali Karal Vikrante Kameshwari Namostu Te.

Kali Karal Vikrante Kameshwari Harpriya.

Namostu to Kameshwari, the essence of all scriptures.

Kamarupa- Pradeepe cha Neelkoot- Nivasini.

Nishumbha- Shumbhamathani Kameshwari Namostu Te.

Kamakhye Kamarupasthe Kameshwari Haripriya.

I pray to Kameshwari daily in the desires of my body.

Vapanadhyavaktre tribhuvaneshwari.

Mahishasurvadhe Devi Kameshwari Namostu Te.

Chagatushte Mahabhime Kamakhye Survandite.

Jai Kamprade Tushte Kameshwari Namostu Te.

Bhrastrarajyo yada raja navamya niyatah shuchih.

Ashtamyacha Chatudardashyamupvasi Narottamah.

The states enjoying Sanvatsaren are free from trouble again.

Ya Idam Shrunuvadbhaktya Tav Devi Samudbhavam.

Shrikamarupeshwari bhaskarprabhe, prakatambhojanibhayatanne.

Surārī-Rakṣaḥ – Stutipatānotsuke, Trayīmaye Devānute Namāmī.

Sitsite Raktapishangavigrahe,

Rupani Yasya: Pratibhanti Taani.

Vikarrupa Cha Vikalpitani,

Good wishes and good wishes.

Kamrup Samudbhute Kampeethavatanske.

Vishwadhare Mahamaye Kameshwari Namostu Te.

Avyakt Vigrahe Shante Santate Kamarupini.

Shante Kameshwari Namostu te beyond Kalgamye.

Or Sushmunantaralashtha Chintyate Jyotirupini.

Pranatosmi paran veeran kameshwari namostu te.

Danshtrakaralvadane mundamalopsobhite.

Sarvvath Sarvavge Devi Kameshwari Namostu Te.

Chamunde Cha Mahakali Kali Kapal- Harini.

Paashaste dandahaste kameshwari namostu te.

Chamunde Kulmalasye Tikshandanshtra Mahabale.

Namostu to Goddess Kameshwari at the funeral home.

।। Iti Shri Kamakhya Stotram Sampoornam ।।

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FAQ’s

कामाख्या देवी की पूजा करने से क्या होता है?

कामाख्या देवी की पूजा करने से मुख्य रूप से मानव जीवन का उद्धार, सुख-शांति, रोगों से मुक्ति, संतान प्राप्ति में मददरूप, कामना पूर्ण करने में आपको मदद मिल सकती है।

कामाख्या इतनी शक्तिशाली क्यों है?

इस देवी के मुख्य शक्तिपीठ की पूजा विभिन्न तांत्रिक रूप से किया जाता है इसीलिए कामाख्या देवी को शक्तिशाली माना जाता है।

कामाख्या देवी की पूजा कब करनी चाहिए?

मां कामाख्या की पूजा ज्यादातर नवरात्री, माघ मास, मंगलवार, अमावस और कामाख्या जयंती पर की जाती है। वैसे तो उनके भक्तों द्वारा हर रोज उसकी पूजा करते है।

कामाख्या मंदिर में किस चीज की अनुमति नहीं है?

कामाख्या मंदिर में पुरुषों की प्रवेश की अनुमति नहीं है। यह मंदिर मुख्यत्वे महिलाओं के लिए प्रख्यात है और इसे महाशक्ति पीठों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि यहां मां कामाख्या निवास करती हैं और इसलिए पुरुषों को मुख्य मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है।पुरुषों अपनी पूजा और सेवा मंदिर के बहार से ही कर सकते हैं। महिलाएं अपने मासिक धर्म के दौरान मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकतीं।

कामाख्या मंदिर में दर्शन करने में कितना समय लगता है?

कामाख्या मंदिर का दर्शन के लिए लंबी कतारों से बचने के लिए वीआईपी टिकट सुबह 6:00 बजे काउंटर से शुरू हो जाता हैं। मंदिर में दर्शन के लिए मूल्य INR 500/- प्रति व्यक्ति है। अगर आप वीआईपी टिकट के साथ दर्शन के लिए जाते हो तो आपको लगभग 1-2 घंटे दर्शन करने में लगते है। यदि आपके पास वीआईपी टिकट नहीं है तो आपको दर्शन करने में 3-5 घंटे लग सकते है।

Kshama Prarthana Durga – क्षमा प्रार्थना मंत्र इन हिंदी lyrics & English

  • क्षमा प्रार्थना मंत्र (Kshama Prarthana) एक ऐसा अमूल्य मंत्र है, जो व्यक्ति यह मंत्र का उच्चारण करता है उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है। यह मंत्र का उच्चारण इतनी शक्तियों के साथ जुड़ा हुआ है की जिससे हम अपनी गलतियों को स्वीकारने और माफ करने का बल प्राप्त करने में उपयोगी होता है।

Kshama Prarthana – क्षमा प्रार्थना हिंदी अनुवाद सहित 

  • क्षमा प्रार्थना लिरिक्स मानवता की सबसे महत्वपूर्ण रिवाज में से एक है। यह मंत्र हमें दूसरों के अपराधों को सहने की क्षमता प्रदान करते है, जिससे हम समर्थन, अनुकूलता, और प्रेम की भावना से जीवन में उचित रह सकते हैं।
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  • क्षमा प्रार्थना मंत्र हिंदी में जो व्यक्ति पढ़ता है वह क्षमा करने की ताकत को पहचान जाता है। यह मंत्र हमें यह सिखाता है की क्षमा एक शक्ति है, ना की कमजोरी। यह मंत्र व्यक्ति को आत्मनिरीक्षण और स्वयं को सुधारने की ताकत रखता है, जिसे हर व्यक्ति अपने जीवन को बेहतर बना सके।

 

  • क्षमा प्रार्थना मंत्र की आश्चर्यजनक परिस्थिति को समझाने के लिए हम आपको एक उदाहरण लेके समझाते है। यह मंत्र की सिख हमें राजा हरिश्चंद्र की कहानी से मिलती है, जिन्होंने अपने जीवन में बहुत सारी कठिनाईयों का सामना किया और उन्हें क्षमा की भावना से समाप्त किया।

 

  • क्षमा प्रार्थना मंत्र इन हिंदी मंत्र एक मुख्य रूप से व्यक्ति अपने जीवन के कुछ उद्देशय को ध्यान में रखकर पढ़ता है। हर व्यक्ति को इस मंत्र पढ़ने के पीछे का कारन कोई बड़ी समस्या को उलझने का उद्देशय होता है। यह मंत्र पढ़ कर इतना तो आप सीख जाते हो की सामने वाले को क्षमा कैसे कर दिया जाए। यह मंत्र व्यक्ति को उसके दिल को शांति और समर्थन पालन करने में मददरूप होता है।

Durga Kshama Prarthana Mantra in Hindi

ॐ अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया | 

दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि || १ || 

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् | 

पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि || २ || 

हे परमेश्वरि परम भगवती रात और दिन मेरे द्वारा सहस्त्र अपराध हुआ करते है | 

मेरा यह दास है ( में आपका दस हु ) ऐसा समझकर तुम मुझ पर कृपा करके मेरे अपराधों को क्षमा करो || १ || 

ना में आवाहन करना जानता हु 

ना में विसर्जन करना जनता हु 

ना पूजा करना जानता हु 

हे परमेश्वरि मेरे अपराधों को क्षमा करो || २ || 

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि |  

यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु में || ३ || 

अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत् | 

यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रह्मादयः सुराः || ४ ||

हे सुरेश्वरि मैंने जो मंत्रहीन ( ना में मंत्र को जानता हु )

क्रियाहीन ( ना में क्रियाओ को जानता  हु )

भक्तिहीन ( ना में भक्ति के प्रकार को जानता हु )

पूजन किया है वो सब आपकी कृपा और दया से पूर्ण हो || ३ || 

सौ प्रकार के अपराध करने के बाद भी भक्तगण

 आपकी शरण में आकर सिर्फ “जगदम्बा”

बोलकर भी गति को प्राप्त करते है,

उसे ब्रह्मा आदि देवगण भी प्राप्त करने में असमर्थ है || ४ || 

सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके | 

इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु || ५ || 

अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम् | 

तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि || ६ || 

हे जगदम्बिके में अपराधी हु तुम्हारी शरण में आया हु |

में दयापात्र हु | तुम जैसा चाहो करो || ५ || 

मुझसे अज्ञानवश जो भी अपराध हुआ है 

उसे आप क्षमा करो और मुझपर प्रसन्न हो || ६ || 

कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानंदविग्रहे | 

गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि || ७ || 

गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् | 

सिद्धिर्भवतु में देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि || ८ || 

सच्चिदानन्दस्वरूपा परमेश्वरि जगन्माता परमेश्वरि | 

आप प्रेमपूर्वक मेरी इस पूजा को स्वीकार करो | 

और मुझपर सदैव प्रसन्न रहो || ७ || 

देवि | सुरेश्वरि तुम गोपनीयसे गोपनीय वस्तुकी रक्षा करनेवाली हो | 

मेरी इस प्रार्थना को जप को ग्रहण करो | 

तुम्हारी ही कृपा से मुझे सिद्धि प्राप्ति हो || 

|| श्री दुर्गार्पणं अस्तु || 

Kshama Prarthana in English

Aawaham na janami, na janami visarjanam!

Pooja chaiv na janami kshamasva parmeshwara!!

Mantaheenam, kriyaheenam bhakiheenam janardanam!

Yatpoojitam maya dev, paripoorna tadmastu me!!

क्षमा प्रार्थना मंत्र लिरिक्स हिंदी में PDF (Durga Saptashati)

हमने यहाँ पे एक टेबल दिया हुआ है, जहां से आप पीडीऍफ़ फाइल डाउनलोड कर सकते हो।

titledescription
PDF NameDurga Kshama Prarthana PDF
PDF Size269 KB
No. Of Pages2
LanuguageHindi
CategoryStotram

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Nagendra Haraya Trilochanaya Lyrics in Hindi, Sanskrit, PDF

Nagendra Haraya Trilochanaya Lyrics (नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय) यह शब्द एक प्रसिद्ध भगवान शिव के स्तोत्र का हिस्सा है जिसे भगवान की महिमा का गुणगान करने के लिए बोला जाता है। इस स्तोत्र के शब्द भक्तों को शिव के दिव्य स्वरूप के प्रति श्रद्धा और भक्ति का अभिव्यक्ति का साधन करने में मदद करते हैं।

यह स्तोत्र शिव भक्तों के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव होता है और उन्हें उनके परमेश्वर के साथ एक गहरा संबंध अनुभव करने में मदद करता है। यह स्तोत्र भक्ति और श्रद्धा के वातावरण को बनाता है और भगवान के साथ एक मजबूत कनेक्शन को प्रोत्साहित करता है। हम Nagendra Haraya के बारे में और इसके महत्व के बारे में बात करेंगे, और यह स्तोत्र Hindi, Sanskrit और English में क्यों महत्वपूर्ण है वह हम देखेंगे।

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Shiva Panchakshara Stotram Benefits – Importance of Nagendra Haraya Trilochanaya Lyrics

भगवान शिव की महिमा – Shiva Panchakshara Stotra भगवान शिव की महिमा का गुणगान करता है और उनके दिव्य गुणों की सराहना करता है। इसमें भगवान के अद्वितीय रूप, शक्ति, और अनुग्रह का वर्णन होता है।

भक्ति का अभिव्यक्ति – यह स्तोत्र शिव भक्तों के द्वारा उनकी भक्ति और श्रद्धा का अभिव्यक्ति का माध्यम बनता है। भक्तों के द्वारा इसका पाठ किया जाता है ताकि वे भगवान की पूजा और सेवा में समर्पित रह सकें।

आध्यात्मिक विकास – Shiva Panchakshara Stotram के पाठ का आध्यात्मिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। यह स्तोत्र भक्तों को आत्मा के शांति और समृद्धि की ओर प्रवृत्त कर सकता है।

संतोष और शांति – इस स्तोत्र का पठन भक्तों को मानसिक शांति, सुख, और समृद्धि की प्राप्ति करने में मदद कर सकता है। यह आत्मा को भगवान के प्रति भक्ति और समर्पण की ओर प्रवृत्त करता है।

सुंदरता का प्रतीक –  इस स्तोत्र का पाठ भक्तों को भगवान शिव के सुंदरता के प्रति विश्वास दिलाता है। उनके अद्वितीय रूप, जैसे कि नीलकंठ (नीला गला) और चंद्रमौली (चंद्रमा की झुल्ली पहने हुए), का वर्णन है, जो उनके दिव्यता के प्रतीक हैं।

मोक्ष की प्राप्ति-  इस स्तोत्र का पाठ भगवान शिव की कृपा और मोक्ष की प्राप्ति की कामना करते हुए किया जाता है। शिव जी को नाम लेने वाले भक्त के जीवन में मोक्ष की प्राप्ति होती है, और वह संसार के बंधनों से मुक्त होता है।

भगवान की स्तुति का महत्व: – इस स्तोत्र का पाठ भगवान की स्तुति का एक महत्वपूर्ण तरीका है। यह भक्तों को दिव्य शक्ति के साथ एक मानसिक और आत्मिक संबंध बनाने में मदद करता है, जो उनके आत्मिक विकास को समर्थन देता है।

सांस्कृतिक धरोहर – यह स्तोत्र हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा है और भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह धर्मिक संगीत, कविता, और भक्ति के क्षेत्र में भारतीय साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है और भक्तों के लिए आध्यात्मिक आनंद का स्रोत है।

Nagendra Haraya Trilochanaya Lyrics in Hindi, Sanskrit

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय
तस्मै नकाराय नमः शिवाय

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय
नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय
तस्मै मकाराय नमः शिवाय

शिवाय गौरीवदनाब्जबृंदा
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय
तस्मै शिकाराय नमः शिवाय

वशिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमूनीन्द्र देवार्चिता शेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय
तस्मै वकाराय नमः शिवाय

यज्ञस्वरूपाय जटाधराय
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय
तस्मै यकाराय नमः शिवाय

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसंनिधौ ।
शिवलोकमावाप्नोति शिवेन सह मोदते

Shiva Panchakshara Stotram in English

Aum namah shivaya shivaya namah aum
Aum namah shivaya shivaya namah aum

nagendraharaya trilochanaya
bhasmangaragaya mahesvaraya
nityaya suddhaya digambaraya
tasmai na karaya namah shivaya

mandakini salila chandana charchitaya
nandisvara pramathanatha mahesvaraya
mandara pushpa bahupushpa supujitaya
tasmai ma karaya namah shivaya

shivaya gauri vadanabja brnda
suryaya dakshadhvara nashakaya
sri nilakanthaya Vrshadhvajaya
tasmai shi karaya namah shivaya

vashistha kumbhodbhava gautamarya
munindra devarchita shekharaya
chandrarka vaishvanara lochanaya
tasmai va karaya namah shivaya

yagna svarupaya jatadharaya
pinaka hastaya sanatanaya
divyaya devaya digambaraya
tasmai ya karaya namah shivaya

panchaksharamidam punyam yah pathechchiva
sannidhau shivalokamavapnoti sivena saha modate

Nagendra Haraya Trilochanaya Lyrics (नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय) एक महत्वपूर्ण भगवान शिव का स्तोत्र है जो भगवान की महिमा और गुणों की सराहना करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है। यह भगवान के प्रति व्यक्ति की भक्ति और समर्पण का अभिव्यक्ति के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि यह एक अद्वितीय माध्यम होता है जो भगवान के दिव्यता को अनुभव करने में मदद करता है।

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Ram Raksha Stotra Lyrics in Hindi, English PDF – राम रक्षा स्तोत्र

राम रक्षा स्तोत्र (Ram Raksha Stotra Lyrics in Hindi, English with PDF) एक ऐसा महत्वपूर्ण स्तोत्र है जो भगवान राम के आराध्य भक्तों द्वारा प्रतिदिन पढ़ा जाता है। यह स्तोत्र हिन्दू धर्म में भगवान राम को एक मानवता के अवतार के रूप में पूजा जाता है और उनके गुणों की महिमा को गाने के लिए कई प्राचीन स्तोत्र हैं।  हम जानेंगे कि यह स्तोत्र का महत्व क्या है और इसके जाप के क्या लाभ होते हैं। श्री राम रक्षा स्तोत्र पाठ संस्कृत और हिंदी में भी लिखा गया है।

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राम रक्षा स्तोत्र का महत्व और चमत्कार 

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राम की रक्षा – यह स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य भगवान राम की रक्षा करना है। यह स्तोत्र उनके परम आध्यात्मिक शक्तियों का वर्णन करता है और उनकी कृपा को प्राप्त करने का प्रयास करता है।

आशीर्वाद – यह स्तोत्र के पठन से व्यक्ति भगवान राम के आशीर्वाद को प्राप्त करते हैं। यह उनके जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि का स्रोत बन सकता है।

आध्यात्मिक विकास – स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास होता है। यह उनके मानसिक शांति, आत्मा की सुख-शांति, और दिव्यता की ओर प्रवृत्त कर सकता है।

दुर्भाग्य और बुराइयों से मुक्ति – यह स्तोत्र का पाठ व्यक्ति को दुर्भाग्य, बुराइयों, और बुरी दशाओं से मुक्ति प्रदान कर सकता है।

आंतरिक शांति – श्री राम रक्षा स्तोत्र के पाठ का जाप करने से मानसिक शांति, सुख, और समृद्धि की प्राप्ति हो सकती है। यह आत्मा को शांति की ओर प्रवृत्त करता है।

 

 

Ram Raksha Stotra Lyrics in Hindi 

राम रक्षा स्तोत्र इन हिंदी

 

||  विनियोग:  ||

श्रीगणेशायनम: ।

अस्य श्रीरामरक्षास्त्रोतमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः ।
श्री सीतारामचंद्रो देवता ।
अनुष्टुप छंदः। सीता शक्तिः ।
श्रीमान हनुमान कीलकम ।
श्री सीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्त्रोतजपे विनियोगः ।

||  अथ ध्यानम्‌:  ||
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपदमासनस्थं,
पीतं वासो वसानं नवकमल दल स्पर्धिनेत्रम् प्रसन्नम ।
वामांकारूढ़ सीता मुखकमलमिलल्लोचनम्नी,
रदाभम् नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलम् रामचंद्रम ॥

||  राम रक्षा स्तोत्रम्:  ||
चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥1॥

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितं ॥2॥

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥3॥

रामरक्षां पठेत प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥4॥

कौसल्येयो दृशो पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुति ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥5॥

जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥6॥

करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥7॥

सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
उरु रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृताः ॥8॥

जानुनी सेतुकृत पातु जंघे दशमुखांतकः ।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामअखिलं वपुः ॥9॥

एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृति पठेत ।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥10॥

पातालभूतल व्योम चारिणश्छद्मचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥11॥

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन ।
नरौ न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥12॥

जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥13॥

वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत ।
अव्याहताज्ञाः सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥14॥

आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः ।
तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥15॥

आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान स नः प्रभुः ॥16॥

तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥17॥

फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥18॥

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥19॥

आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशा वक्ष याशुगनिषङ्गसङ्गिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम ॥20॥

सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन् मनोरथान नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः ॥21॥

रामो दाशरथी शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥22॥

वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥23॥

इत्येतानि जपन नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥24॥

रामं दुर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरः ॥25॥

रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं,
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम ।
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शांतमूर्तिं,
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम ॥26॥

रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥27॥

श्रीराम राम रघुनन्दनराम राम,
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम,
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥28॥

श्रीराम चन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि,
श्रीराम चंद्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीराम चन्द्रचरणौ शिरसा नमामि,
श्रीराम चन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥29॥

माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः स्वामी,
रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्नान्यं,
जाने नैव जाने न जाने ॥30॥

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मज ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥31॥

लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथं ।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥32॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीराम दूतं शरणं प्रपद्ये ॥33॥

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम ॥34॥

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥35॥

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम् ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥36॥

रामो राजमणिः सदा विजयते,
रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता,
निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं,
रामस्य दासोस्म्यहं रामे चित्तलयः,
सदा भवतु मे भो राम मामुद्धराः ॥37॥

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥38॥

॥ इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम् ॥

॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥

राम रक्षा स्तोत्र (Ram Raksha Stotra Lyrics in Hindi, English with PDF) भगवान राम के आशीर्वाद को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है और यह व्यक्ति को दुर्भाग्य, संकट, और आत्मिक दुखों से मुक्ति प्रदान कर सकता है। इसे भगवान की कृपा और आशीर्वाद का माध्यम माना जाता है, और व्यक्ति के जीवन को शांति, सुख, और समृद्धि से भर सकता है।

 

Ram Raksha Stotra Lyrics in English

 

Viniyogah

Asya Shree Raama Rakshaa Stotra Mantrasya Budhakaushika Rishih Shree Seetaa Raamachandro Devataa Anushtup Chhandah Seetaa Shaktih Shreemaan Hanumaan Keelakam Shree Raamachandra Preetyarthe Raama Rakshaa Stotra Jape Viniyogah ।

Dhyaanam

Dhyaayedaa Jaanubaahum Dhritashara Dhanusham Baddha Padmaasanastham
Peetam Vaaso Vasaanam Nava Kamaladala Spardhinetram Prasannam ।
Vaamaankaarudha Seetaa Mukhakamala Milallochanam Neeradaabham
Naanaalankaara Deeptam Dadhatamuru Jataamandalam Raamachandram ।

 

Stotram

Charitam Raghunaathasya Shatakoti Pravistaram ।
Ekaikamaksharam Punsaam Mahaapaataka Naashanam ॥1॥

Dhyaatvaa Neelotpala Shyaamam Raamam Raajeeva Lochanam ।
Jaanakee Lakshmanopetam Jataamukuta Manditam ॥2॥

Saasituna Dhanurbaana Paanim Naktam Charaantakam ।
Svaleelayaa Jagattraatumaa Virbhutamajam Vibhum ॥3॥

Raamarakshaam Pathetpraagyah Paapaghneem Sarva Kaamadaam ।
Shiro Me Raaghavah Paatu Bhaalam Dasharathaatmajah ॥4॥

Kausalyeyo Drishau Paatu Vishvaamitra Priyah Shrutee ।
Ghraanam Paatu Makhatraataa Mukham Saumitri Vatsalah ॥5॥

Jihvaam Vidyaanidhih Paatu Kantham Bharata Vanditah ।
Skandhau Divyaayudhah Paatu Bhujau Bhagnesha Kaarmukah ॥6॥

Karau Seetaapatih Paatu Hridayam Jaamadagnyajit ।
Madhyam Paatu Kharadhvansee Naabhim Jaambavadaashrayah ॥7॥

Sugreeveshah Katee Paatu Sakthinee Hanumatprabhuh ।
Uru Raghuttamah Paatu Rakshah Kulavinaasha Krit ॥8॥

Jaanunee Setukritpaatu Janghe Dashamukhaantakah ।
Paadau Vibheeshana Shreedah Paatu Raamoakhilam Vapuh ॥9॥

Etaam Raamabalo Petaam Rakshaam Yah Sukritee Pathet ।
Sa Chiraayuh Sukhee Putree Vijayee Vinayee Bhavet ॥10॥

Paataala Bhutalavyoma Chaarinashchhadma Chaarinah ।
Na Drashtumapi Shaktaaste Rakshitam Raama Naamabhih ॥11॥

Raameti Raamabhadreti Raamachandreti Vaa Smaran ।
Naro Na Lipyate Paapairbhuktim Muktim Cha Vindati ॥12॥

Jagajjaitraika Mantrena Raama Naamnaabhi Rakshitam ।
Yah Kanthe Dhaarayettasya Karasthaah Sarva Siddhayah ॥13॥

Vajrapanjara Naamedam Yo Raama Kavacham Smaret ।
Avyaahataagyah Sarvatra Labhate Jayamangalam ॥14॥

Aadishta Vaanyathaa Svapne Raama Rakshaa Mimaam Harah ।
Tathaa Likhita Vaanpraatah Prabuddho Budhakaushikah ॥15॥

Aaraamah Kalpa Vrikshaanaam Viraamah Sakalaa Padaam ।
Abhiraamastri Lokaanaam Raamah Shreemaansa Nah Prabhuh ॥16॥

Tarunau Rupa Sampannau Sukumaarau Mahaabalau ।
Pundareeka Vishaalaakshau Cheera Krishnaa Jinaambarau ॥17॥

Phalamulaashinau Daantau Taapasau Brahmachaarinau ।
Putrau Dasharatha Syaitau Bhraatarau Raama Lakshmanau ॥18॥

Sharanyau Sarva Sattvaanaam Shreshthau Sarva Dhanushmataam ।
Rakshah Kula Nihantaarau Traayetaam No Raghuttamau ॥19॥

Aattasajja Dhanushaa Vishusprishaa
Vakshayaa Shuganishanga Sanginau ।
Rakshanaaya Mama Raama Lakshmanaa
Vagratah Pathi Sadaiva Gachchhataam ॥20॥

Sannaddhah Kavachee Khadgee Chaapa Baanadharo Yuvaa ।
Gachchhan Manorathaannashcha Raamah Paatu Salakshmanah ॥21॥

Raamo Daasharathih Shuro Lakshmanaa Nucharo Balee ।
Kaakutsthah Purushah Purnah Kausalyeyo Raghuttamah ॥22॥

Vedaanta Vedyo Yagyeshah Puraana Purushottamah ।
Jaanakee Vallabhah Shreemaana Prameya Paraakramah ॥23॥

Ityetaani Japannityam Madbhaktah Shraddhayaanvitah ।
Ashvamedhaa Dhikam Punyam Sampraapnoti Na Sanshayah ॥24॥

Raamam Durvaadala Shyaamam Padmaaksham Peeta Vaasasam ।
Stuvanti Naama Bhirdivyairna Te Sansaarino Naraah ॥25॥

Raamam Lakshmana Purvajam Raghuvaram Seetaapatim Sundaram
Kaakutstham Karunaarnavam Gunanidhim Viprapriyam Dhaarmikam ।
Raajendram Satyasandham Dasharatha Tanayam Shyaamalam Shaanta Murtim
Vande Lokaabhiraamam Raghukula Tilakam Raaghavam Raavanaarim ॥26॥

Raamaaya Raamabhadraaya Raamachandraaya Vedhase ।
Raghunaathaaya Naathaaya Seetaayaah Pataye Namah ॥27॥

Shree Raama Raama Raghunandana Raama Raama
Shree Raama Raama Bharataagraja Raama Raama ।
Shree Raama Raama Ranakarkasha Raama Raama
Shree Raama Raama Sharanam Bhava Raama Raama ॥28॥

Shree Raama Chandra Charanau Manasaa Smaraami
Shree Raama Chandra Charanau Vachasaa Grinaami ।
Shree Raama Chandra Charanau Shirasaa Namaami
Shree Raama Chandra Charanau Sharanam Prapadye ॥29॥

Maataa Raamo Matpitaa Raama Chandrah
Svaamee Raamo Matsakhaa Raama Chandrah ।
Sarvasvam Me Raama Chandro Dayaalurnaanyam
Jaane Naiva Jaane Na Jaane ॥30॥

Dakshine Lakshmano Yasya Vaame Cha Janakaatmajaa ।
Purato Maarutiryasya Tam Vande Raghunandanam ॥31॥

Lokaabhiraamam Rana Rangadheeram
Raajeeva Netram Raghuvansha Naatham ।
Kaarunya Rupam Karunaakaram Tam
Shree Raama Chandram Sharanam Prapadye ॥32॥

Manojavam Maaruta Tulyavegam
Jitendriyam Buddhimataam Varishtham ।
Vaataatmajam Vaanara Yutha Mukhyam
Shree Raama Dutam Sharanam Prapadye ॥33॥

Kujantam Raama Raameti Madhuram Madhuraaksharam ।
Aaruhya Kavitaa Shaakhaam Vande Vaalmeeki Kokilam ॥34॥

Aapadaama Pahartaaram Daataaram Sarva Sampadaam ।
Lokaabhiraamam Shree Raamam Bhuyo Bhuyo Namaamyaham ॥35॥

Bharjanam Bhava Beejaanaa Marjanam Sukha Sampadaam ।
Tarjanam Yamadutaanaam Raama Raameti Garjanam ॥36॥

Raamo Raajamanih Sadaa Vijayate Raamam Ramesham Bhaje
Raamenaa Bhihataa Nishaachara Chamu Raamaaya Tasmai Namah ।
Raamaannaasti Paraayanam Parataram Raamasya Daasoasmyaham
Raame Chittalayah Sadaa Bhavatu Me Bho Raama Maamuddhara ॥37॥

Raama Raameti Raameti Rame Raame Manorame ।
Sahasranaama Tattulyam Raama Naama Varaanane ॥38॥

 

Ram Raksha Stotra Lyrics in English Completed ॥

 

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Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi with Stotram- Vishnumaya

विष्णु सहस्रनाम (Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi Stotram) एक प्राचीन और महत्वपूर्ण हिन्दू ग्रंथ है जिसमें भगवान विष्णु के 1000 नाम और उनकी महिमा का वर्णन है। यह ग्रंथ महाभारत के शांतिपर्व में धर्मराज युधिष्ठिर के द्वारका आगमन के समय ब्राह्मण जबल द्वारा प्रस्तुत किया गया था। हम जानेंगे कि विष्णु सहस्रनाम (Vishnu Sahasranamam Lyrics)  ग्रंथ का महत्व क्या है और इसके पढ़ाई के लाभ क्या हैं।

 

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विष्णु सहस्रनाम का महत्व

 

भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन: यह ग्रंथ में भगवान विष्णु  के 1000 नामों का उल्लेख है, जो उनकी महिमा, गुण, और शक्तियों का वर्णन करते हैं। यह ग्रंथ विष्णु के प्रेमी भक्तों के लिए उनके दिव्य गुणों का स्मरण करने का सुंदर तरीका है।

ध्यान और साधना के लिए:  इस के पाठ का जप ध्यान और आध्यात्मिक साधना के लिए एक महत्वपूर्ण उपाय है। यह मानसिक शांति, आत्मा की सुख-शांति, और दिव्यता का माध्यम बन सकता है।

पुण्य का अच्छा स्रोत:  इस का पाठ (vishnumaya sahasranamam) करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक पुण्य प्राप्त होता है। यह ग्रंथ भगवान के नामों का जाप करने वाले को आशीर्वाद और सुख की प्राप्ति में मदद करता है।

कर्मों का सुखद परिणाम:  इस का पाठ करने से कर्मों का सुखद परिणाम मिलता है। यह ग्रंथ व्यक्ति के कर्मों को पूर्णता और सफलता की ओर प्रवृत्त कर सकता है।

आध्यात्मिक संवाद:  इस का पाठ करने से व्यक्ति का आध्यात्मिक संवाद भगवान के साथ होता है। यह उनके अंतरंग स्थितियों को समझने का माध्यम बन सकता है।

 

Vishnumaya Sahasranamam

Om sree vishnumaya swamine namah
Om sree bhuvaneswaryai namah
Ohm shri ponnuni vishnumaye namaha
Ohm sri vishnumaya kuttichathaya namah

Aum namo bhagavathi balasatwaya, shivasuthaya, vishnumaya sahithaya,
Sachidananda, parabrahma, paramapurusha paramatmane hum phat swaha

Om shree vishnumaye namaha
Om gaurishankarasutaaya namaha

Om shree vishnumaye namaha
Om bhootaganaanvithaaya namaha

Om shree vishnumaye namaha
Om duritashamanaaya namaha

Om shree vishnumaye namaha
Om paramaanandaroopaaya namaha

Om shree vishnumaye namaha
Om dukkhavinaashakaaya namaha

Om shree vishnumaye namaha
Om maayaavigrahaaya namaha

Om shree vishnumaye namaha
Om dukkhavinaashakaaya namaha

Om shree vishnumaye namaha
Om mitrajanolsukhaaya namaha

Om shree vishnumaye namaha
Om vaavanapujitaaya namaha

Om shree vishnumaye namaha
Om akhilagunamurthaye

Om shree vishnumaye namaha
Om mangalaaya namaha
Om shree vishnumaye namaha

 

 

Vishnu Sahasranamam Lyrics Hindi Stotram

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:

ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः ।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः ।। 1 ।।

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमं गतिः।
अव्ययः पुरुष साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च ।। 2 ।।

योगो योग-विदां नेता प्रधान-पुरुषेश्वरः ।
नारसिंह-वपुः श्रीमान केशवः पुरुषोत्तमः ।। 3 ।।

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणु: भूतादि: निधि: अव्ययः ।
संभवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभु: ईश्वरः ।। 4 ।।

स्वयंभूः शम्भु: आदित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादि-निधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ।। 5 ।।

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभो-अमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ।। 6 ।।

अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतः त्रिककुब-धाम पवित्रं मंगलं परं ।। 7।।

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्य-गर्भो भू-गर्भो माधवो मधुसूदनः ।। 8 ।।

ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृति: आत्मवान ।। 9 ।।

सुरेशः शरणं शर्म विश्व-रेताः प्रजा-भवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ।। 10 ।।

अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादि: अच्युतः ।
वृषाकपि: अमेयात्मा सर्व-योग-विनिःसृतः ।। 11 ।।

वसु:वसुमनाः सत्यः समात्मा संमितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ।। 12 ।।

रुद्रो बहु-शिरा बभ्रु: विश्वयोनिः शुचि-श्रवाः ।
अमृतः शाश्वतः स्थाणु: वरारोहो महातपाः ।। 13 ।।

सर्वगः सर्वविद्-भानु:विष्वक-सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविद-अव्यंगो वेदांगो वेदवित् कविः ।। 14 ।।

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृता-कृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूह:-चतुर्दंष्ट्र:-चतुर्भुजः ।। 15 ।।

भ्राजिष्णु भोजनं भोक्ता सहिष्णु: जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ।। 16 ।।

उपेंद्रो वामनः प्रांशु: अमोघः शुचि: ऊर्जितः ।
अतींद्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ।। 17 ।।

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः।
अति-इंद्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ।। 18 ।।

महाबुद्धि: महा-वीर्यो महा-शक्ति: महा-द्युतिः।
अनिर्देश्य-वपुः श्रीमान अमेयात्मा महाद्रि-धृक ।। 19 ।।

महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानंदो गोविंदो गोविदां-पतिः ।। 20 ।।

मरीचि:दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ।। 21 ।।

अमृत्युः सर्व-दृक् सिंहः सन-धाता संधिमान स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ।। 22 ।।

गुरुःगुरुतमो धामः सत्यः सत्य-पराक्रमः ।
निमिषो-अ-निमिषः स्रग्वी वाचस्पति: उदार-धीः ।। 23 ।।

अग्रणी: ग्रामणीः श्रीमान न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्र-मूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात ।। 24 ।।

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सं-प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निः अनिलो धरणीधरः ।। 25 ।।

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृक्-विश्वभुक्-विभुः ।
सत्कर्ता सकृतः साधु: जह्नु:-नारायणो नरः ।। 26 ।।

असंख्येयो-अप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्ट-कृत्-शुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ।। 27।।

वृषाही वृषभो विष्णु: वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुति-सागरः ।। 28 ।।

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेंद्रो वसुदो वसुः ।
नैक-रूपो बृहद-रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ।। 29 ।।

ओज: तेजो-द्युतिधरः प्रकाश-आत्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मंत्र:चंद्रांशु: भास्कर-द्युतिः ।। 30 ।।

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिंदुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्य-धर्म-पराक्रमः ।। 31 ।।

भूत-भव्य-भवत्-नाथः पवनः पावनो-अनलः ।
कामहा कामकृत-कांतः कामः कामप्रदः प्रभुः ।। 32 ।।

युगादि-कृत युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजित्-अनंतजित ।। 33 ।।

इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्टः शिखंडी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत कर्ता विश्वबाहु: महीधरः ।। 34 ।।

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपाम निधिरधिष्टानम् अप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ।। 35 ।।

स्कन्दः स्कन्द-धरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद भानु: आदिदेवः पुरंदरः ।। 36 ।।

अशोक: तारण: तारः शूरः शौरि: जनेश्वर: ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ।। 37 ।।

पद्मनाभो-अरविंदाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत ।
महर्धि-ऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुड़ध्वजः ।। 38 ।।

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षण लक्षण्यो लक्ष्मीवान समितिंजयः ।। 39 ।।

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतु: दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवान-अमिताशनः ।। 40 ।।

उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ।। 41 ।।

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो-ध्रुवः ।
परर्रद्वि परमस्पष्टः तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ।। 42 ।।

रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयो-अनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठ: धर्मो धर्मविदुत्तमः ।। 43 ।।

वैकुंठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ।। 44।।

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्व-दक्षिणः ।। 45 ।।

विस्तारः स्थावर: स्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम ।
अर्थो अनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ।। 46 ।।

अनिर्विण्णः स्थविष्ठो-अभूर्धर्म-यूपो महा-मखः ।
नक्षत्रनेमि: नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ।। 47 ।।

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमं ।। 48 ।।

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत ।
मनोहरो जित-क्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ।। 49 ।।

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ।। 50 ।।

धर्मगुब धर्मकृद धर्मी सदसत्क्षरं-अक्षरं ।
अविज्ञाता सहस्त्रांशु: विधाता कृतलक्षणः ।। 51 ।।

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद गुरुः ।। 52 ।।

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीर भूतभृद्भोक्ता कपींद्रो भूरिदक्षिणः ।। 53 ।।

सोमपो-अमृतपः सोमः पुरुजित पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः ।। 54 ।।

जीवो विनयिता-साक्षी मुकुंदो-अमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनंतात्मा महोदधिशयो-अंतकः ।। 55 ।।

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनंदो नंदनो नंदः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ।। 56 ।।

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाश्रृंगः कृतांतकृत ।। 57 ।।

महावराहो गोविंदः सुषेणः कनकांगदी ।
गुह्यो गंभीरो गहनो गुप्तश्चक्र-गदाधरः ।। 58 ।।

वेधाः स्वांगोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणो-अच्युतः ।
वरूणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ।। 59 ।।

भगवान भगहानंदी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णु:-गतिसत्तमः ।। 60 ।।

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिवि:स्पृक् सर्वदृक व्यासो वाचस्पति:अयोनिजः ।। 61 ।।

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक ।
संन्यासकृत्-छमः शांतो निष्ठा शांतिः परायणम ।। 62 ।।

शुभांगः शांतिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ।। 63 ।।

अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृत्-शिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ।। 64 ।।

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमान्-लोकत्रयाश्रयः ।। 65 ।।

स्वक्षः स्वंगः शतानंदो नंदिर्ज्योतिर्गणेश्वर: ।
विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ।। 66 ।।

उदीर्णः सर्वत:चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ।। 67 ।।

अर्चिष्मानर्चितः कुंभो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ।। 68 ।।

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ।। 69 ।।

कामदेवः कामपालः कामी कांतः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णु: वीरोअनंतो धनंजयः ।। 70 ।।

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृत् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ।। 71 ।।

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ।। 72 ।।

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ।। 73 ।।

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ।। 74 ।।

सद्गतिः सकृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ।। 75 ।।

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयो-अनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरो-अथापराजितः ।। 76 ।।

विश्वमूर्तिमहार्मूर्ति:दीप्तमूर्ति: अमूर्तिमान ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ।। 77 ।।

एको नैकः सवः कः किं यत-तत-पद्मनुत्तमम ।
लोकबंधु: लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ।। 78 ।।

सुवर्णोवर्णो हेमांगो वरांग: चंदनांगदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरऽचलश्चलः ।। 79 ।।

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ।। 80 ।।

तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश्रृंगो गदाग्रजः ।। 81 ।।

चतुर्मूर्ति: चतुर्बाहु:श्चतुर्व्यूह:चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भाव:चतुर्वेदविदेकपात ।। 82 ।।

समावर्तो-अनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ।। 83 ।।

शुभांगो लोकसारंगः सुतंतुस्तंतुवर्धनः ।
इंद्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ।। 84 ।।

उद्भवः सुंदरः सुंदो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः श्रृंगी जयंतः सर्वविज-जयी ।। 85 ।।

सुवर्णबिंदुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधः ।। 86 ।।

कुमुदः कुंदरः कुंदः पर्जन्यः पावनो-अनिलः ।
अमृतांशो-अमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ।। 87 ।।

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधो औदुंबरो-अश्वत्थ:चाणूरांध्रनिषूदनः ।। 88 ।।

सहस्रार्चिः सप्तजिव्हः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघो-अचिंत्यो भयकृत्-भयनाशनः ।। 89 ।।

अणु:बृहत कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ।। 90 ।।

भारभृत्-कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ।। 91 ।।

धनुर्धरो धनुर्वेदो दंडो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियंता नियमो यमः ।। 92 ।।

सत्त्ववान सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्हो-अर्हः प्रियकृत-प्रीतिवर्धनः ।। 93 ।।

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ।। 94 ।।

अनंतो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकधिष्ठानमद्भुतः ।। 95।।

सनात्-सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत स्वस्ति स्वस्तिभुक स्वस्तिदक्षिणः ।। 96 ।।

अरौद्रः कुंडली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ।। 97 ।।

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ।। 98 ।।

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः संतो जीवनः पर्यवस्थितः ।। 99 ।।

अनंतरूपो-अनंतश्री: जितमन्यु: भयापहः ।
चतुरश्रो गंभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ।। 100 ।।

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मी: सुवीरो रुचिरांगदः ।
जननो जनजन्मादि: भीमो भीमपराक्रमः ।। 101 ।।

आधारनिलयो-धाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ।। 102 ।।

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्यु जरातिगः ।। 103 ।।

भूर्भवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञांगो यज्ञवाहनः ।। 104 ।।

यज्ञभृत्-यज्ञकृत्-यज्ञी यज्ञभुक्-यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृत-यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ।। 105 ।।

आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनंदनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ।। 106 ।।

शंखभृन्नंदकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथांगपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ।। 107 ।।

सर्वप्रहरणायुध ॐ नमः इति।

वनमालि गदी शार्ङ्गी शंखी चक्री च नंदकी ।
श्रीमान् नारायणो विष्णु: वासुदेवोअभिरक्षतु ।

विष्णु सहस्रनाम (Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi Stotram) हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण ग्रंथ है जो विष्णु के महात्म्य का वर्णन करता है और व्यक्तिगत और आध्यात्मिक समृद्धि के लिए एक महत्वपूर्ण साधना के रूप में किया जा सकता है। इसे (vishnumaya sahasranamam) नियमित रूप से पढ़ने और व्यक्तिगत आध्यात्मिक विकास के लिए एक अद्वितीय उपाय माना जाता है।

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Shiv Tandav Stotram PDF: शिव तांडव स्तोत्र सरल भाषा में

हिन्दू धर्म के देवता भगवान शिव का एक अत्यधिक शक्तिशाली और भावपूर्ण शिव तांडव स्तोत्र सरल भाषा में  महिमा और दिव्यता की महत्वपूर्ण झलकियों को हमारे सामने प्रस्तुत करता है। Shiv Tandav Stotram PDF शिव भगवान के नृत्य और उनके महाकालीय रूप की महानता का परिचय देता है, जिसमें देवता का विश्वनाशक तांडव दर्शाया गया है।

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महत्वपूर्ण श्लोकों की महिमा:

शिव तांडव स्तोत्रम  के १६ श्लोक भगवान शिव की महिमा, शक्ति, और दिव्यता को व्यक्त करते हैं। स्तोत्रम के प्रत्येक श्लोक में शिव के विभिन्न रूपों का वर्णन किया गया है, जो विश्व के नायक, सर्वशक्तिमान, और महाकाल के रूप में प्रकट होते हैं।

 

Shiv Tandav Stotram PDF | शिव तांडव स्तोत्र सरल भाषा में 

जटा-टवी-गलज्-जल-प्रवाह-पावित-स्थले
गलेऽव-लम्ब्य लम्बितां भुजङ्ग-तुङ्ग-मालिकाम्
डमड्-डमड्-डमड्-डमन्-निनाद-वड्-डमर्वयं
चकार चण्ड-ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥1॥

जटा-कटाह-सम्भ्रम-भ्रमन्-निलिम्प निर्झरी
विलोल-वीचि-वल्लरी-विराज-मान मूर्धनि।
धगद्-धगद्-धगज्-ज्वलल्-ललाट-पट्ट पावके
किशोर-चन्द्र-शेखरे रतिः प्रति-क्षणं मम: ॥2॥

धरा-धरेन्द्र-नन्दिनी-विलास-बन्धु बन्धुर
स्फुरद्-दिगन्त-सन्तति-प्रमोद-मान मानसे।
कृपा-कटाक्ष-धोरणी-निरुद्ध-दुर्धरा-पदि
क्वचिद्-दिगम्बरे मनो विनोद-मेतु वस्तुनि ॥3॥

जटा भुजङ्गपिङ्गल स्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।
मदान्धसिन्धु रस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥

सहस्र-लोचन-प्रभृत्य-शेष-लेख-शेखर
प्रसून-धूलि-धोरणी-विधू-सराङ्घ्रि-पीठ-भूः।
भुजङ्ग-राज-मालया निबद्ध-जाट-जूटक:
श्रियै चिराय जायतां चकोर-बन्धु-शेखरः ॥5॥

ललाट-चत्वर-ज्वलद्-धनञ्जय-स्फुलिङ्गभा
निपीत-पञ्च-सायकं नमन्-निलिम्प-नायकम्।
सुधा-मयूख-लेखया विराज-मान-शेखरं
महा-कपालि सम्पदे शिरो जटाल-मस्तुनः ॥6॥

कराल-भाल-पट्टिका-धगद्-धगद्-धगज्-ज्वलद्
धनञ्जया-हुती-कृत-प्रचण्ड-पञ्च-सायके।
धरा-धरेन्द्र-नन्दिनी-कुचाग्र-चित्र-पत्रक-
प्रकल्प-नैक-शिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥7॥

नवीन-मेघ-मण्डली-निरुद्ध-दुर्धर-स्फुरत्
कुहू-निशीथिनी-तमः-प्रबन्ध-बद्ध-कन्धरः।
निलिम्प-निर्झरी-धरस्-तनोतु कृत्ति-सिन्धुरः
कला-निधान-बन्धुरः श्रियं जगद्-धुरन्धरः ॥8॥

प्रफुल्ल-नील-पङ्कज-प्रपञ्च-कालिम-प्रभा
वलम्बि-कण्ठ-कन्दली-रुचि-प्रबद्ध-कन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छि-दान्ध-कच्छिदं तमन्त-कच्छिदं भजे ॥9॥

अगर्व-सर्व-मङ्गला-कला-कदम्ब मञ्जरी
रस-प्रवाह-माधुरी-विजृम्भणा-मधु-व्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्त-कान्ध-कान्तकं तमन्त-कान्तकं भजे ॥10॥

जयत्व-दभ्र-विभ्रम-भ्रमद्-भुजङ्ग मश्वस
द्विनिर्गमत्-क्रम-स्फुरत्-कराल-भाल-हव्य-वाट्
धिमिद्-धिमिद्-धिमिद्-ध्वनन्-मृदङ्ग-तुङ्ग-मङ्गल
ध्वनि-क्रम-प्रवर्तित-प्रचण्ड-ताण्डवः शिवः ॥11॥

दृषद्-विचित्र-तल्पयोर्-भुजङ्ग-मौक्ति-कस्रजोर्
गरिष्ठ-रत्न-लोष्ठयोः सुहृद्-विपक्ष-पक्ष-योः।
तृणारविन्द-चक्षुषोः प्रजा-मही-महेन्द्रयोः
समं-प्रवृत्ति-कः कदा सदा-शिवं भजाम्यहम् ॥12॥

कदा निलिम्प-निर्झरी-निकुञ्ज-कोटरे वसन्
विमुक्त-दुर्मतिः सदा शिरःस्थ-मञ्जलिं वहन्।
विलोल-लोल-लोचनो ललाम-भाल-लग्नकः
शिवेति मन्त्र मुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥13॥

निलिम्प नाथ-नागरी कदम्ब मौल-मल्लिका
निगुम्फ-निर्भक्षरन्म धूष्णिका-मनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीं-महनिशं
परिश्रय परं पदं तदङ्ग-जत्विषां चयः॥14॥

प्रचण्ड वाड-वानल प्रभा-शुभ-प्रचारणी
महा-अष्टसिद्धि कामिनी जनावहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचनो विवाह-कालिक-ध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्॥15॥

इमं हि नित्य-मेव-मुक्त-मुत्त-मोत्तमं स्तवं
पठन् स्मरन् ब्रुवन्-नरो विशुद्धि-मेति सन्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्ति-माशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥16॥

पूजा-वसान-समये दश-वक्त्र-गीतं
यः शम्भु-पूजन-परं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथ-गजेन्द्र-तुरङ्ग-युक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥17॥

। इति श्री शिव तांडव स्तोत्र सम्पूर्णम् ।

 

भावभरी नृत्य की अद्वितीयता:

यह स्तोत्रम (shiv tandav stotram lyrics pdf in hindi) में शिव का भयंकर और उत्कृष्ट नृत्य वर्णित है, जिसका दर्शन करने में आत्मा की उच्चतम भावना को प्राप्त होता है। उनके दिव्य नृत्य से प्रकट होने वाली शक्ति और ऊर्जा व्यक्ति को अपने अंतरात्मा की गहराईयों तक ले जाती है।

धार्मिक और मानवीय महत्व:

शिव तांडव स्तोत्र सरल भाषा में न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका मानवीय अर्थ भी गहरा है। यह स्तोत्रम हमें जीवन की अनिश्चितता और परिवर्तन के साथ साहसी रूप से मुकाबला करने की प्रेरणा देता है।

यह एक दिव्य और अद्वितीय स्तोत्रम है जो हमें भगवान शिव के दिव्य रूप और उनकी शक्ति का अनुभव करने का अवसर प्रदान करता है। इसके अंतर्गत वर्णित शिव के नृत्य का दर्शन करने से हमारी आत्मा को उद्दीपन मिलता है और हम अपने जीवन को उद्घाटन और समर्पण की दिशा में प्रस्थान कर सकते हैं।

शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से क्या होता है?

शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से मानव जीवन में विभिन्न प्रकार के शुभ फल प्राप्त हो सकते हैं। यह स्तोत्रम भगवान शिव की महिमा, शक्ति, और दिव्यता का परिचय कराता है और उनके भक्तों को उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने का माध्यम हो सकता है।

शिव जी तांडव कब करते हैं?

शिव जी का तांडव उनकी महाकाल और विनाशकारी रूप की प्रतीक होता है, जब वे विश्व के सर्वोच्च न्यायी और नाशकर्ता रूप में प्रकट होते हैं। तांडव काल उनके नायक और शिव-शक्ति के महत्वपूर्ण पहलु को प्रकट करता है। विश्व के सर्वोच्च न्यायी के रूप में, शिव जी का तांडव ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर तीनों देवताओं के लिए एक समान और न्यायपूर्ण रूप होता है। तांडव के द्वारा वे अधर्म को नष्ट करके धर्म की स्थापना करते हैं। यह तांडव उनके महाकालीय रूप की भी प्रतीक है, जिसमें उनका नृत्य प्रलय की स्थिति की प्रतीक्षा करता है। इस रूप में, शिव जी का तांडव विनाश की प्रक्रिया का प्रतीक होता है और उनकी महाशक्ति का प्रकटीकरण होता है।

शिव तांडव कौन लिखा था?

शिव तांडव का रचनाकार रावण माना जाता है। यह स्तोत्र उनकी देवता के प्रति उनकी भक्ति का परिणाम माना जाता है। रावण रामायण के महाकाव्य में राक्षसराज के रूप में उपस्थित होते हैं और उनकी शक्तियों का वर्णन किया गया है। उन्होंने भगवान शिव की उपासना करके उनकी कृपा प्राप्त की थी, और इसी कृपा का परिणाम स्वरूप उन्होंने शिव तांडव स्तोत्र का रचना किया था।

शिव तांडव कितने प्रकार के होते हैं?

शिव तांडव को विभिन्न प्रकार के तांडवों में विभाजित नहीं किया जाता है। यह एक ही स्तोत्र है जिसमें भगवान शिव की महिमा, शक्ति, और दिव्यता का वर्णन किया गया है। शिव तांडव को उनके महाकालीय रूप का प्रतीक माना जाता है जिसमें उनका नृत्य और उनकी शक्ति का प्रदर्शन होता है। इसमें १६ श्लोक होते हैं जो कि उनके विभिन्न रूपों की गूढ़ भावनाओं को व्यक्त करते हैं।

क्या हम रात में शिव तांडव स्तोत्रम सुन सकते हैं?

जी हां, आप रात में भी शिव तांडव स्तोत्रम का पाठ या सुनाई कर सकते हैं। ध्यान दें कि शिव तांडव स्तोत्रम भगवान शिव की महिमा और उनके दिव्य रूप का वर्णन करने वाला एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक स्तोत्र है। इसका पाठ या सुनना आपके मानसिक और आत्मिक शांति, स्थिरता, और ध्यान को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है। रात में शिव तांडव स्तोत्रम का पाठ करते समय आपको शांत और प्राकृतिक वातावरण में होने की कोशिश करनी चाहिए। आप इसका पाठ करते समय अपने मन को शांत और ध्यानित रखने का प्रयास कर सकते हैं, ताकि आपका ध्यान स्तोत्र के अर्थ और महत्व पर संरचित हो सके।

 

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